न तुम हिंदू हो, न मुसलमान हो, यह हिंदू होना मुसलमान होना, सिखायी हुई बात है - ओशो
न तुम हिंदू हो, न मुसलमान हो, यह हिंदू होना मुसलमान होना, सिखायी हुई बात है - ओशो
प्रश्न--इट इज ए वेरी सिम्पल थाट।
ओशो--नहीं, नहीं, कितना ही सिम्पल इट इज ए थाट। डिसीजन (निर्णय) भी थाट (विचार) है। तुम डिसीजन लोगे न, जोकि नहीं जानता है। दी बेसिक इग्नोरंस रिमेन। कितना ही कंपलीट कान्फिडेंस हो, यह तुम जानते ही रहोगे कि कान्फिडेंस तुम्हारा लाया हआ है। रियलाइजेशन की जल्दी मत करो। जो कंपलीट कान्फिडेंस कर रहा है, वह तो बिलकुल इग्नोरेंट आदमी है। रियलाइजेशन करनेवाले को कान्फिडेंस करने की जरूरत नहीं है। कान्फिडेंस होता है। यह अगर जस्ट कमिंग की बात हो, तो न गाइड की जरूरत है, न गीता की जरूरत है, न धर्म की, न मंदिर की, न मूर्ति की। प्रश्न--अस्पष्ट है। ओशो--क्या मतलब है तुम्हारे हिंदू नहीं रहने का। तुम्हारे रहने की जरूरत ही नहीं है, अगर यह एलीमेंटरी बात है। तो हिंदू होने की क्या जरूरत है? बिलीव्हर करते हो न तुम, तो कुछ करते हो न? अगर तुम हिंदू हो, तो हिंदू होने में बिलीव्हर करते हो न? जब हम कहते हैं कि मैं हिंदू हूं, तो मैं हिंदू होने में बिलीव्हर कर रहा हूं न? तो विलीव्ह तो तुम कर रहे हो।
और अगर कुछ भी नहीं करना है तो इतना कहना भी बेमानी है कि मैं हिंदू हूं। हां, और उसको तुमने बिलीव्ह कर लिया है, और क्या किया है? तो यह पीपुल को डेड जो __ कर रहे हैं हजारों साल से, मैं उसके खिलाफ हूं। मैं कहता हूं, तुम जो हो, हो। न तुम हिंदू हो, न मुसलमान हो। यह हिंदू होना मुसलमान होना, सिखायी हई बात है। और सिखाकर विश्वास दिलाया जा रहा है। बचपन से कि यह आदमी हिंदू है, यह मुसलमान है, यह ईसाई है। और तुम जो हो, वह हो। तुम जो हो, अगर उसे खोजना है, तो इस प्रोपेगेंडा से मुक्त होना पड़ेगा--जो सोसाइटी सिखा रही है कि तुम हिंदू हो, मुसलमान हो, ईसाई हो, तुम फलां हो, तुम ढिका हो। ये बिलकुल झूठी बातें हैं।
-ओशो
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