Friday, April 4.
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    हिंदी सिने जगत का वह दौर जब अभिनेत्रियाँ के परदे पर आने पर दर्शक फूल और पैसे लुटाते थे


    हिंदी सिने जगत का वह दौर जब अभिनेत्रियाँ के परदे पर आने पर दर्शक फूल और पैसे लुटाते थे

    भारतीय सिनेमा के शरुआती दो दशक यानी 1913 से लेकर 1930 के बीच फ़िल्में तो खूब नहीं, लेकिन फ़िल्मों में महिला कलाकारों को लाना बड़ा ही मुश्किल काम था। दादा साहेब फालके ने काफी कोशिश के बाद अधेड़ महिला कमलाबाई गोखले को अपनी दूसरी फ़िल्म 'मोहिनी भस्मासुर' के लिए राजी किया था। उसके बाद फ़िल्मों में काम करने के लिए महिलाएँ खुद आने लगीं। फिर जिनकी चर्चा शुरू हुई उनमें दुर्गाबाई, गौहर, तारा, सुशीला बाई, सुल्ताना, फातिमा, जमुना, जुबैदा, नलिनी, कुसुम कुमारी, गुलाब, सरस्वती, सीता देवी, जिल्लों, पुतलीबाई, दुर्गा, सुलोचना, गंगूबाई, जैबुन्निसां, मल्लिका, रामप्यारी, शहजादी, रमादेवी, हीराबाई, इकबाल बानो, महताब, राजकुमारी, शांता कुमारी, ललिता देवी, रमोला, माधुरी, सविता देवी उल्लेखनीय हैं।

    ___इन उपरोक्त हीरोइनों में से खासकर गौहर, तारा, सुल्ताना, फातिमा, जुबैदा, रामप्यारी, महताब, राजकुमारी, शांता कुमारी, रमोला, माधुरी आदि को खूब चर्चा मिली। चूंकि यह मूक फ़िल्मों का जमाना था, तो इनकी आवाज़ नहीं सुनी जा सकती थी, लेकिन फ़िल्मों में इनकी अदाएँ ऐसी होती थीं कि दर्शक झूम उठते थे, वे आह भरते थे।

    गौहर तो इतनी चर्चित हुई कि उनकी तस्वीर जब माचिस की एक डिब्बी पर छपने लगी, तब लोग वही माचिस खरीदने लगे और उनकी तस्वीर काटकर अपनी कमीज की ऊपर वाली जेब में रखने लगे। तस्वीर को ऊपरवाली जेब में वे इसलिए रखते थे कि गौहर की तस्वीर उनके सीने से लगी रहे। ऐसा होने के कारण उस समय दूसरी माचिस की बिक्री बंद हो गई। उस ज़माने की एक और मशहूर अभिनेत्री जुबैदा एक राजघराने से आई थीं। उन्होंने बहुत सी फ़िल्मों में काम किया। उनकी खूबसूरती लोग देखते नहीं थकते थे। यही वजह थी कि जब बोलती फ़िल्म 'आलम आरा' की तैयारी होने लगी तो आर्देशिर माखान ईरानी की नज़र में कोई और हीरोइन नहीं वे ही बसीं। उन्हें ही भारत की पहली बोलती फ़िल्म की हीरोइन बनने का अवसर मिला।

    देखें तो 1913 से शुरू हुए फीचर फिल्मों के सफर में 1920 तक ऐसी हीरोइनें बहुत देखी गई, जिन्हें लोगों ने कई-कई फ़िल्मों में देखा। इन हीरोइनों की तब बात ही निराली थी और हर चर्चित हीरोइन से जुड़ी एक न एक कहानी लोगों द्वारा सुनी जाती थी। इस काल में आई फिल्मों के विषय ज्यादातर भक्ति संबंधी थे या फिर किसी ऐतिहासिक या अरब की कहानियों वाले या फिर महापुरूषों पर आधारित कहानी वाले। अरब की कहानी वाली फ़िल्मों में प्रेम में डूबे हीरोइनों के दृश्य देखकर दर्शक अश...अश... करते और आह भरते थे। तब भी लोग इन हीरोइनों को देखते हुए वैसे ही नहीं थकते थे जैसे दर्शक आज की हीरोइनों के दीवाने हैं।

    तब का ज़माना ऐसा था, जब फ़िल्म देखना अच्छी बात नहीं मानी जाती थी, लेकिन हीरोइनों के दीवाने दर्शक उन्हें दिल से पसंद करते थे और उनकी फिल्मों को लगातार देखते थे। वे जब पर्दे पर आती थीं तो दर्शक फूल और पैसे लुटाते थे। यही वह वक्त था जब किसी भक्ति फ़िल्म के चरित्र में आई इन हीरोइनों को दर्शक हाथ जोड़कर प्रणाम भी करते थे और जब किसी कलाकार को दिल से पसंद करते थे, तो उसके बारे में गलत कभी नहीं बोलते थे।

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